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Book Detail

Mahapragya Vaangmay-062 (Dharm Mujhe Kya Dega) (महाप्रज्ञ वांग्मय-062 (धर्म मुझे क्या देगा))

Author: Acharya Mahapragya
Category: Mahapragya Vangmay
Released: 2019
Language: Hindi
Pages: 0
350 (Inclusive all of Taxes)
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मनुष्य की बुद्धि व्यावसायिक होती है इसलिए वह लेन-देन की भाषा मे ज्यादा सोचता है और बोलता है। धर्म कोई व्यवसाय नहीं है फिर भी उसकी उपयोगिता समझने के लिए व्यक्ति व्यावसायिक भाषा का प्रयोग करता है। प्रस्तुत पुस्तक में चेतना की स्वाभाविक परिणति को दर्शया गया है।
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