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Book Detail

Author: Acharya Mahapragya
Category: Pravachan Sahitya
Released: 2012
Language: Hindi
Pages: 265
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220
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इस पुस्तक में तीन प्रश्नों की विशद चर्चा की गई है- 1 कैसे सोचें 2 हृदय-परिवर्तन के सूत्र क्या हैं 3 भय-मुक्ति के उपाय क्या हैं 1 कैसे सोचें मनुष्य मन वाला प्राणी है इसलिए वह सोचता है। सोचना मन का काम है। पशु भी मन वाला प्राणी है पर उसका नाड़ी-संस्थान विकसित नहीं होता इसलिए उसमें सोचने की क्षमता भी विकसित नहीं होती। मनुष्य का नाड़ी-संस्थान विकसित होता है इसलिए वह सोचने की उच्चतम भूमिका तक जा सकता है। शरीर और मन का परस्पर गहरा संबंध है। शरीर से मन प्रभावित होता है और मन से शरीर प्रभावित होता है। मन शरीर को अधिक प्रभावित करता है। इस पारस्परिक प्रभाव के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि मनुष्य का चिंतन विधायक या रचनात्मक होता है तब शरीर भी स्वस्थ रहता है। निषेधात्मक चिंतन शारीरिक विकृति भी पैदा करता है। मोहनीय कर्म या मूर्च्छा से जुड़ा हुआ सारा का सारा चिन्तन निषेधात्मक होता है। मूर्च्छा की उपशांति के क्षणों में होने वाला चिन्तन विधायक बन जाता है। विधायक चिंतन से सामाजिक और मानवीय संबंधों में सुधार होता है। उससे विकास और प्रगति का पथ प्रशस्त हो जाता है। निषेधात्मक भावों से सामाजिक और मानवीय संबंधों में कटुता पैदा होती है, प्रगति का पथ अवरूद्ध हो जाता है। प्रेक्षाध्यान के अभ्यास से निषेधात्मक भाव कम होते जाते हैं और विधायक भाव बढ़ते चले जाते हैं। 2 हृदय परिवर्तन विश्व का समूचा विकास परिवर्तन का विकास है। जो जैसे है वैसे ही रहे तो विकास संभव नहीं होता। मनुष्य बाहरी परिस्थिति को बदलने में बहुत सफल हुआ है। उसे आंतरिक परिस्थिति के बदलाव में उतनी सफलता नहीं मिली है। हृदय-परिवर्तन तब घटित होता है जब आंतरिक परिवर्तन होता है। आंतरिक परिवर्तन के तीन अंग हैं- भाव का परिवर्तन, विचार का परिवर्तन और रसायनों का परिवर्तन। भाव विचार को पैदा करता है। विचार भाव को पैदा नहीं करता। जैसा भाव वैसा विचार। जब भाव बदलता है तो विचार भी बदलता है और मन भी बदलता है। जब विचार और मन बदलते हैं तब आंतरिक रसायन भी बदलते हैं। यहीं से हृदय-परिवर्तन प्रारंभ होता है। भाव, विचार और रसायनों के बदलने की प्रक्रिया एक अनुस्यूत प्रक्रिया है। यह आश्रव-शोधन की प्रक्रिया है। यह हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसके पांच सूत्र हैं- 1 एकाग्रता का अभ्यास 2 समता का अभ्यास 3 जागरूकता का अभ्यास 4 वस्तु-निष्ठ आकर्षण का परिवर्तन 5 मिथ्यादृष्टिकोण का परिवर्तन। 3 भय-मुक्ति भय की उत्पत्ति के चार मूल स्रोत हैं- 1 सत्त्वहीनता 2 भय की मति 3 भय का सतत चिंतन 4 भय के परमाणुओं का उत्तेजित होना। भय की पांच प्रतिक्रियाएं हैं- रोग बुढ़ापा मरण विस्मृति और पागलपन। भय-मुक्ति के साधन कौन-कौन से हैं और प्रेक्षाध्यान की प्रक्रिया उन साधनों के क्रियान्वयन में कैसे सहयोगी करती हैं- यह सब इस अध्याय में विवृत हैं। इस पुस्तक में चिंतन की प्रक्रिया के कुछ सूत्र हृदय-परिवर्तन के कुछ उपाय और भय-मुक्ति के कुछ साधनों की चर्चा प्रस्तुत की गई है।
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